आह्वान

दिल की गहराइयों से

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rajuahuja


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मात्र संयोग , अथवा ….?

Posted On: 28 Aug, 2012  
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क्या सचमुच हम …….??

Posted On: 14 Aug, 2012  
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ये कैसी आज़ादी रे भाई ….?

Posted On: 11 Aug, 2012  
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डेरे के नीचे क्या है …? डेरे के भीतर ……..?

Posted On: 21 Jul, 2012  
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आखिर है क्या धर्म ……..?

Posted On: 14 Jul, 2012  
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मन की बात ………….!

Posted On: 26 Jun, 2012  
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गंगा आये कहाँ से , ये गंगा जाए कहाँ रे ……!

Posted On: 9 Jun, 2012  
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आओ बाबा बाबा खेलें ..!

Posted On: 7 Jun, 2012  
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अडवाणी , हे अडवाणी तुम रोज रोज रथ क्यों नहीं लाते ..?

Posted On: 1 Nov, 2011  
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एक रामायण ऐसी भी …………….?

Posted On: 22 Oct, 2011  
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तुम्हें क्या मालूम …….

Posted On: 21 Aug, 2011  
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नंदिता राव शर्म करो

Posted On: 19 Aug, 2011  
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“जै कारा नेताजी का” …….बोल……?

Posted On: 30 Jul, 2011  
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खुला ख़त अन्ना के नाम ,

Posted On: 25 Jun, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

राजुभाई ईस में जो भिखारी है उसे भारत के नागरिक नही समजा जाता है । उन के पास घर नही है तो राशन कार्डवाली पहेचान नही है । पहेचान नही तो वोटर लिस्ट में नाम नही है । तो वो सरकारी खुराक (वोटर) नही है । ईन का भला क्यों करे । हां, एक रास्ता है । सरकार के कान में कोइ फुंक मारे की बंगला देसियों की तर्ज पर ईन को भी जोपडी और राशन कार्ड दे दो और ईन को अपना बना लो वोटर बना कर । आप को ही वोट देंगे । दुसरे जो गरीब है वो पहले से सरकारी खुराक है । और सरकार को कच्चा चबाने का ही शौक है । ईन का विकास कर के ईन को पकाना अकलमंदी नही है । पक जाने पर वोट कीसे दे दे भरोसा नही । जे.जे के पके हुए आदमियों का कोइ भरोसा कर सकता है ?

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

मान्यवर मोहिदर जी ! जैसा की मैंने पहले ही कहा है प्रचलित धर्म तो धर्म है ही नहीं,सभी थोपे गए संबोधन मात्र हैं !जैसे हम अपने जानवर विशेष के नाम रख देते हैं टाइगर / शेरा / टामी वगैरा-वगैरा इससे उस जानवर विशेष का कोई लेना-देना नहीं उसे उसकी पहचान के लिए कोई एक नाम एक संबोधन चाहिए ताकि वो भीड़ में पहचाना जा सके ! कदाचित आज आदमी की धर्म के सन्दर्भ में ठीक ऐसी ही स्थिति है वह संबोधन को धर्म समझता है जो कत्तई धर्म नहीं ! और जब अलग-अलग नाम हैं अलग-अलग पहचान है तो वर्गीकरण स्वाभाविक है ! बिना धर्म के अनुभव के, बिना धर्म का स्वभाव जाने, अपनी-अपनी सुविधानुसार इसे परिभाषित किया गया है !मक्कारों, ठेकेदारों ने इसे जीविका का साधन बना लिया है, जब की धर्म जीवन जीने की कला है ! तथा-कथित राजनीतिज्ञों ने इसे सत्ता प्राप्ति का हथियार बना लिया है ! और मूढ़ बगैर जाने-समझे इन प्रचलित धर्मो की छाया में धन्य-धन्य हो रहे है ! धर्म से अनजान व्यक्ति के लिए धर्म गणिका / वैश्या कुछ भी हो सकता है क्यों कि सभी संबोधन मात्र ही तो हैं ! चूँकि धर्म समझने का विषय है अतः ज्ञानी के लिए धर्म अनंत, असीमित है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं, जितना जानो कम है ! धर्म कोई वस्तु नहीं जिसे घर के अन्दर रक्खा जाये यह तो विचार है,,,, भाव है, जिसका न कोई रूप है ,न आदि, न अंत !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

आहूजा जी, प्रत्येक शब्द की परिभषा विभिन्न व्यक्तियों के लिये भिन्न भिन्न होती है. जहां तक धर्म का स्वाल है वह मेरी राय में इस प्रकार है समाज के लिये = एक वर्गी करण भर एक व्यक्ति के लिये = एक ऐसी पहचान जो उसे जन्म से मिली और शायद जो जीवन में उसके लिये अच्छे से ज्यादा बुरा अनुभव लिये हो सकती है. धर्म के ठेकेदारों और नेताओं के लिये = एक धारदार हथियार जिससे वह अपने स्वार्थ के लिये किसी का भी गला काट सकते हैं एक धार्मिक व्यक्ति के लिये = एक वन्दना और एक आत्मिक शान्ति की वस्तु मेरे व्यक्तिगत विचार से "धर्म" जब तक मन में या घर में रहता है तब तक वह पूजनीय है.. जैसे ही वह गली चौराहो और सडक पर आ जाता है... एक दलाल या वैश्या से ज्यादा कुछ नहीं होता. लिखते रहिये.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

मित्रवर , धर्म की व्याख्या करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है ! धर्म तो असीम है, धर्म परोपकार है आत्मबोध है धर्म ! सत्य करुना प्रेमयुक्त भाव जब अंतस में उतरता है तो धर्म की लौ प्रज्वलित होती है तब अंत-प्रज्ञां जागती है और मिटता है अहंकार ! निर्विकार प्रज्ञां से होती है भावशुद्धि / विचारशुद्धि तब होता है मनन ! मनन से ही धर्म से सम्बन्ध बनता है ! शास्त्र कितना ही पढो धर्म से सम्बन्ध नहीं बनेगा ! मंदिर मस्जिद कोई धर्म से सम्बन्ध नहीं जोड़ पायेगा ! धर्म तो तब आता है जब कोई जाग जाता है ! भीतर से सुरति आती है ! धर्म मज़हब नहीं / धर्म रिलिज़न नहीं ! धर्म का वही अर्थ है जो बुद्ध के धम्मं का है ! धर्म का अर्थ है स्वभाव ! धर्म को आप जितना जानेंगे पाएंगे की यह तो कम है ,बहुत कुछ अभी और है जानने को ! ज्ञानियों का मत है , जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ ! मैं मूढा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ !!

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

धर्म तो भाव है, अनुभूति है, उस परमात्मा की !जब अंतर्मन में प्रेम, त्याग ,कोमलता, करूणा के भाव उठते हैं तब व्यक्ति के भीतर बीज-रूप में छुपा धर्म का पौधा पनपता है, जो उसका नितांत व्यक्तिगत है !जिसके फूलों की गंध से उसके व्यक्तित्व में निखार आता है ! तब सारे भेद मिट जाते हैं सारी दीवारें ढह जाती हैं सब-कुछ एकदम साफ हो जाता है अपने-पराये का भेद नहीं रहता आदरणीय आहूजा जी बहुत सुन्दर चर्चा और स्वागत योग्य उदगार आप के ...सत में चित जब खो जाता है तब आनंद आता है सब अनुभव होने लगता है कोई अपना नहीं कोई पराया नहीं जब तक हम मोह माया को गंभीरता से नहीं समझते ये जाल हमें घेरे रहता है जैसे जैसे हम उस नित्यानंद में डूबते जाते हैं सब कुछ स्पष्ट होना शुरू हो जाता है ...बहुत सुन्दर ..धर्म धर्म अपना इनका कर क्यों लड़ कर मरना आइये मानव धर्म को समझें भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

आदरणीय राज जी, निम्न पंक्यतियों में आपने धर्म को बहुत ही सुन्दर ढ़ंग से परिभाषित किया हैः- "धर्म अनुभव/महसूस करने की कला है !मंदिर की घंटियों में ,अज़ान के स्वर में,चिड़ियों के चहचहाने में ,झरने के कल-कल करते संगीत में वृक्षों के लहलहाने में ! इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! अततः धार्मिक होना फक्र की बात है !" किन्तु मैं आपकी आस्तिकता की परिभाषा से सहमत नहीं हूँ, मेरा मानना है कि सत्य में आस्था या विश्वास करने या रखने वाला व्यक्ति ही आस्तिक है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

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