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अडवाणी , हे अडवाणी तुम रोज रोज रथ क्यों नहीं लाते ..?

Posted On: 1 Nov, 2011 में

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अडवाणी हे अडवाणी तुम रोज-रोज रथ क्यों नहीं लाते ?
तेरे आने से सडकों के सारे गड्डे हैं भर जाते ,
वर्षों से सड़ता कचरा भी गायब रातों-रात हो गया ,
पटी पड़ी नाली से कीचड़ जैसे कोई जिन्न ले गया ,
झंडे-बैनर बैसाखी के मेले सी हैं याद दिलाते ,
अडवाणी हे अडवाणी तुम रोज-रोज रथ क्यों नहीं लाते ?

अश्व-मेघ सा कृत्य तुम्हारा,किसे जीतने को आतुर है ,
पृष्टभूमि में अभिलाषा ,सत्ता की प्यास लिए व्याकुल है ,
झूठे वादे फिर किसना के बंजर खेत हरे कर देंगें ,
रामदीन के सूखे घट में उम्मीदों का नीर भरेंगें ,
छलनी-छलनी सा यह जीवन,हर बार छला हर बार लुटा ,
फिर भी आशा की डोर से बन्ध,हम तपे जेठ सावन हैं गाते,
अडवाणी हे अडवाणी तुम रोज-रोज रथ क्यों नहीं लाते ?

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
November 17, 2011

प्रिय राजू आहूजा जी बहुत ही सटीक और मार्मिक पंक्तियाँ मन को छू जाती हैं ये राज नीति वाले क्या समझेंगे ये उदगार गहन पीड़ा …सच कुछ तो भला हो ही जाता है ….सुन्दर भ्रमर ५ अश्व-मेघ सा कृत्य तुम्हारा,किसे जीतने को आतुर है , पृष्टभूमि में अभिलाषा ,सत्ता की प्यास लिए व्याकुल है , झूठे वादे फिर किसना के बंजर खेत हरे कर देंगें , रामदीन के सूखे घट में उम्मीदों का नीर भरेंगें , छलनी-छलनी सा यह जीवन,हर बार छला हर बार लुटा , फिर भी आशा की डोर से बन्ध,हम तपे जेठ सावन हैं गाते,

    rajuahuja के द्वारा
    November 17, 2011

    माननीय भ्रमर जी , आपका स्वागत है ! आज आम आदमी की पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं ! कभी-कभी तो लगता है की , यदा-यदा ही धर्मस्य ….का शंखनाद करने वाले मधुसुदन भी अपना वादा भूल गए शायद !

nishamittal के द्वारा
November 3, 2011

राज जी केवल अडवानी क्यों जो भी बड़ा नेता आएगा रथ से या कार से गड्ढा रहित होंगी सड़कें वो बात दूसरी की उनके निकलते ही उससे बड़े गड्ढे बन जाएँ नहीं तो बुलाएँ मायावती को मुझको मालूम नहीं आप कहाँ रहते हैं.,पर अधिकारी मेरे विचार से मायावती से ही डरते हैं.

    rajuahuja के द्वारा
    November 16, 2011

    निशा जी , सर्वप्रथम प्रतिक्रिया पर आभार ! पूरा पखवाडा ब्लाग से अनुपस्थित के कारण हुए विलम्ब पर खेद ! सच है ,देश को खड्डे में डालने वाले खुद खड्डों से बचते हैं !जहाँ तक मायावती से डरने का सवाल है तो चोर चोर मौसेरे भाई ,छोटा चोर बड़े चोर से डरे कोई नई बात नहीं !

Santosh Kumar के द्वारा
November 2, 2011

आदरणीय राजू जी ,.सादर नमस्कार अभिलाषा ,.सत्ता की प्यास अलग चीज है ,..रथ लाने में बहुत खर्चा हो जाता है …बढ़िया लगी आपकी रचना ..साभार

    rajuahuja के द्वारा
    November 2, 2011

    आभार संतोष जी !

shashibhushan1959 के द्वारा
November 1, 2011

मैनें अपना काम कर दिया, जन-जन में जागृति भर दिया, अब तन में भर  गई थकन है, हारूँगा तो फिर आऊँगा, मैं अडवानी – मैं अडवानी, रोज-रोज क्या रथ लाऊंगा ?

    rajuahuja के द्वारा
    November 2, 2011

    आपका स्वागत है शशिभूषण जी !


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