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आखिर है क्या धर्म ........?

Posted On: 14 Jul, 2012 Others में

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पिछले कई दिनों से देखा कुछ ब्लागर मित्र किसी स्थापित धर्म का चोला पहन उसके गुण-गान में जुट जाते हैं !मानो उनका धर्म ही सबसे बड़ा धर्म है,ऐसी स्थिति में किसी अन्य स्थापित धर्म के व्यक्ति को यह गुण-गान हज़म नहीं होता !और न होना स्वाभाविक भी है ! आखिर धर्म के साथ-साथ व्यक्ति का अहंकार भी तो जुड़ा है,और एक अहंकार किसी दूसरे अहंकार को कैसे बर्दाश्त करेगा ?
धर्म तो भाव है, अनुभूति है, उस परमात्मा की !जब अंतर्मन में प्रेम, त्याग ,कोमलता, करूणा के भाव उठते हैं तब व्यक्ति के भीतर बीज-रूप में छुपा धर्म का पौधा पनपता है, जो उसका नितांत व्यक्तिगत है !जिसके फूलों की गंध से उसके व्यक्तित्व में निखार आता है ! तब सारे भेद मिट जाते हैं सारी दीवारें ढह जाती हैं सब-कुछ एकदम साफ हो जाता है अपने-पराये का भेद नहीं रहता ! धार्मिकता जाति-बन्धनों से कहीं दूर है !स्थापित नियम कायदे / प्रचलित धार्मिकता के लिए हो सकते हैं लेकिन वास्तविक धार्मिकता इन आडम्बरों से कोसों दूर है !
धार्मिक होने के लिए किसी भाषा ज्ञान की आवश्यकता नहीं ! किसी ग्रन्थ के अध्ययन की ज़रूरत नहीं !किसी संप्रदाय के लेबल की ज़रूरत नहीं ! सच तो यह है की इंसान पैदा ही धार्मिक होता है क्यों की उस अवस्था में उसे किसी धर्म का ज्ञान नहीं होता उसे तथाकथित धार्मिक तो हम बनाते हैं अपना प्रचलित धर्म थोप कर जब की वो सहजता से इसे स्वीकार नहीं करता !लेकिन यहाँ उसे स्वीकारने अथवा अस्वीकारने का समय ही कहाँ !जब तक वो इसे समझने की अवस्था में आये तब तक तो उस पर किसी प्रचलित धर्म की मोहर लग चुकी होती है !
यह भी सत्य है की हम सब थोपे गए धर्म के अनुयायी मात्र हैं !धार्मिक तो कत्तई नहीं !क्योकि हमने कभी भी धर्म को जानने-समझने की चेष्टा ही नहीं की ! दरअसल बगैर जाने -समझे ही हमारा कम तो चल ही रहा था फिर क्या ज़रूरत क्यों बेकार की बात में समय बर्बाद करें !बहुत सारे काम हैं हटाओ इस झंझट को ! यह हमें झंझट लगता है !कई पढ़े-लिखे समझदार ( ? ) लोग कहते सुने ,यह धर्म-वर्म सब बेकार की बातें हैं कुछ हासिल नहीं होने वाला इन बातों से ! गौर से देखा जाये तो उनकी बातों में सच्चाई तो है !क्योंकि उन्होंने इन्हीं प्रचलित धर्मों को देखा-समझा है !और पाया की धर्म से इंसान का कोई भला नहीं होने वाला !
सच्चाई तो यह है की इनका धर्म से कोई साक्षात्कार हुआ ही नहीं !बात ऐसी है मान लें आपने कभी गुलाब जामुन खाए ही नहीं और आपसे पूछा जाये की बताइए गुलाब-जामुन का स्वाद कैसा है ?आपने सुना है ये मीठे होते हैं अतः आपका उत्तर होगा मीठे !किन्तु उस मिठास के साथ जो सुगंध -स्वाद है उसका क्या ? यह आपको नहीं मालूम क्यों की गुलाब-जामुन तो आपने कभी खाए ही नहीं ! ठीक इसी तरह ये प्रचलित धर्म हैं जिनसे आप तथा-कथित धार्मिक तो बनते हैं लेकिन धर्म से अनभिज्ञ !
धार्मिक व्यक्ति आस्तिक होता है वह अपने क्रित्य में असीम की कृपा देखता है तब चित्त आनंद से भर जाता है ! दुःख से भरा चित्त नास्तिक सा है ! नास्तिकता Gravitation है जो सदैव नीचे की ओर खींचती है ! और आस्तिकता Grace प्रसाद /अनुग्रह जो ऊपर की ओर जाता है !
कुलमिलाकर धर्म अनुभव/महसूस करने की कला है !मंदिर की घंटियों में ,अज़ान के स्वर में,चिड़ियों के चहचहाने में ,झरने के कल-कल करते संगीत में वृक्षों के लहलहाने में ! इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! अततः धार्मिक होना फक्र की बात है !

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 5, 2012

विचारणीय लेख. बधाई

    rajuahuja के द्वारा
    August 7, 2012

    आभार कुशवाहा जी !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 21, 2012

इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! अततः धार्मिक होना फक्र की बात है ! जो कर्म केवल अपने ही लाभ के लिए न हो सर्व कल्याण के लिए हो वो ही धर्म है. बधाई. 

    rajuahuja के द्वारा
    July 21, 2012

    स्वागत है कुशवाहा जी, प्रणाम ! आपकी प्रतिक्रिया मेरा मनोबल है ,ह्रदय से आभार !

Mohinder Kumar के द्वारा
July 18, 2012

आहूजा जी, प्रत्येक शब्द की परिभषा विभिन्न व्यक्तियों के लिये भिन्न भिन्न होती है. जहां तक धर्म का स्वाल है वह मेरी राय में इस प्रकार है समाज के लिये = एक वर्गी करण भर एक व्यक्ति के लिये = एक ऐसी पहचान जो उसे जन्म से मिली और शायद जो जीवन में उसके लिये अच्छे से ज्यादा बुरा अनुभव लिये हो सकती है. धर्म के ठेकेदारों और नेताओं के लिये = एक धारदार हथियार जिससे वह अपने स्वार्थ के लिये किसी का भी गला काट सकते हैं एक धार्मिक व्यक्ति के लिये = एक वन्दना और एक आत्मिक शान्ति की वस्तु मेरे व्यक्तिगत विचार से “धर्म” जब तक मन में या घर में रहता है तब तक वह पूजनीय है.. जैसे ही वह गली चौराहो और सडक पर आ जाता है… एक दलाल या वैश्या से ज्यादा कुछ नहीं होता. लिखते रहिये.

    rajuahuja के द्वारा
    July 18, 2012

    मान्यवर मोहिदर जी ! जैसा की मैंने पहले ही कहा है प्रचलित धर्म तो धर्म है ही नहीं,सभी थोपे गए संबोधन मात्र हैं !जैसे हम अपने जानवर विशेष के नाम रख देते हैं टाइगर / शेरा / टामी वगैरा-वगैरा इससे उस जानवर विशेष का कोई लेना-देना नहीं उसे उसकी पहचान के लिए कोई एक नाम एक संबोधन चाहिए ताकि वो भीड़ में पहचाना जा सके ! कदाचित आज आदमी की धर्म के सन्दर्भ में ठीक ऐसी ही स्थिति है वह संबोधन को धर्म समझता है जो कत्तई धर्म नहीं ! और जब अलग-अलग नाम हैं अलग-अलग पहचान है तो वर्गीकरण स्वाभाविक है ! बिना धर्म के अनुभव के, बिना धर्म का स्वभाव जाने, अपनी-अपनी सुविधानुसार इसे परिभाषित किया गया है !मक्कारों, ठेकेदारों ने इसे जीविका का साधन बना लिया है, जब की धर्म जीवन जीने की कला है ! तथा-कथित राजनीतिज्ञों ने इसे सत्ता प्राप्ति का हथियार बना लिया है ! और मूढ़ बगैर जाने-समझे इन प्रचलित धर्मो की छाया में धन्य-धन्य हो रहे है ! धर्म से अनजान व्यक्ति के लिए धर्म गणिका / वैश्या कुछ भी हो सकता है क्यों कि सभी संबोधन मात्र ही तो हैं ! चूँकि धर्म समझने का विषय है अतः ज्ञानी के लिए धर्म अनंत, असीमित है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं, जितना जानो कम है ! धर्म कोई वस्तु नहीं जिसे घर के अन्दर रक्खा जाये यह तो विचार है,,,, भाव है, जिसका न कोई रूप है ,न आदि, न अंत !

Punita Jain के द्वारा
July 17, 2012

आदरणीय आहूजा जी, अपने इस लेख में धर्म की बहुत सुन्दर और सार्थक व्याख्या की है और उसके सही अर्थ को सबके सामने रखा है | आपने सही कहा — धर्म तो भाव है, अनुभूति है, उस परमात्मा की !जब अंतर्मन में प्रेम, त्याग ,कोमलता, करूणा के भाव उठते हैं तब व्यक्ति के भीतर बीज-रूप में छुपा धर्म का पौधा पनपता है |दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! अततः धार्मिक होना फक्र की बात है !

    rajuahuja के द्वारा
    July 17, 2012

    माननीया पुनीता जी, सादर ! दरअसल तथा-कथित धर्म के ठेकेदारों ने धर्म के मायने ही बदल दिए हैं ,फलस्वरूप जनमानस में धर्म सांप्रदायिक विषय बन गया है ! स्थिति यह है की लोग धर्म के नाम से भी कतराने लगे हैं ! लोग धार्मिक होने की बजाय सेक्युलर कहलाना पसंद करते हैं !

Chandan rai के द्वारा
July 16, 2012

अहुजा जी , में धर्म जैसी किसी चीज को नहीं मानता है ,या कह लिजिय की धर्म बरगलाया हुआ पाखंड है , इसका छालिक अस्तित्व है , मानवता सबसे जरुरी चीज है , और सबसे बड़ा कर्म !

    rajuahuja के द्वारा
    July 16, 2012

    माननीय चन्दन राय जी, सादर ! आप बिलकुल ठीक करते हैं जो धर्म को नहीं मानते ! धर्म मानने वाली चीज है भी नहीं ! लोग सदियों से यही गलती करते आ रहे है ! दरअसल धर्म मानने का नहीं समझने का विषय है ! लोग हैं की माने चले जा रहे हैं अंधानुसरण ! आप ही बताये गीता / बाइबल / कुरआन / को कितने लोग समझते हैं ? लेकिन मानते सभी हैं ,हैरत की बात है समझते नहीं लेकिन मानते ज़रूर हैं ! सीधी सी बात है समझने में समय या यों कहें उम्र लग जाती है लेकिन मानना बिलकुल आसन ! जब हम किसी को समझने की बजाय मानने लगते हैं तो उससे दूर होते चले जाते हैं कदाचित यही स्थिति धर्म की है !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
July 16, 2012

धर्म तो भाव है, अनुभूति है, उस परमात्मा की !जब अंतर्मन में प्रेम, त्याग ,कोमलता, करूणा के भाव उठते हैं तब व्यक्ति के भीतर बीज-रूप में छुपा धर्म का पौधा पनपता है, जो उसका नितांत व्यक्तिगत है !जिसके फूलों की गंध से उसके व्यक्तित्व में निखार आता है ! तब सारे भेद मिट जाते हैं सारी दीवारें ढह जाती हैं सब-कुछ एकदम साफ हो जाता है अपने-पराये का भेद नहीं रहता आदरणीय आहूजा जी बहुत सुन्दर चर्चा और स्वागत योग्य उदगार आप के …सत में चित जब खो जाता है तब आनंद आता है सब अनुभव होने लगता है कोई अपना नहीं कोई पराया नहीं जब तक हम मोह माया को गंभीरता से नहीं समझते ये जाल हमें घेरे रहता है जैसे जैसे हम उस नित्यानंद में डूबते जाते हैं सब कुछ स्पष्ट होना शुरू हो जाता है …बहुत सुन्दर ..धर्म धर्म अपना इनका कर क्यों लड़ कर मरना आइये मानव धर्म को समझें भ्रमर ५

    rajuahuja के द्वारा
    July 16, 2012

    माननीय भ्रमर जी ! दया ,करुणा त्याग युक्त धर्म से चित्त निर्मल होता है, भेद मिटते हैं ! ह्रदय प्रेमभाव से भर जाता है ,तब ……….!

allrounder के द्वारा
July 16, 2012

नमस्कार भाई राजू झा जी, धर्म अपने आप मैं कुछ नहीं है, ये तो मानने वाले के ऊपर निर्भर करता है की वह धर्म को किस रूप मैं देखता है मेरे विचार से धर्म सिर्फ मन की शांति के लिए है और हर धर्म अच्छे संस्कार ही प्रचारित करता है, हाँ मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो अपनी सुविधानुसार इसकी परिभाषाएं बदलता रहता है अपितु दुनिया मैं सबसे बड़ा धर्म तो इंसानी धर्म है जिसे ज्यादातर लोगों ने नकार दिया है !

    rajuahuja के द्वारा
    July 16, 2012

    प्रिय मित्र, allrounder जी , नमस्कार ! आप कहते हैं धर्म अपने आप में कुछ नहीं ! आप ही कहते हैं धर्म मन की शांति के लिए है ! फिर कहते हैं हर धर्म अच्छे संस्कार ही प्रचारित करता है ! दरअसल आपकी मनः-स्थिति विचलित है ! दुर्भाग्य से हर ओर यही स्थिति है ,आपके अकेले का दोष नहीं ! विचलित मन / असमंजस स्थिति / विचारों में सामंजस्य नहीं सब गड-मड ! ज़रूरत है शांत-चित्त से समझने की , चूँकि धर्म समझने का विषय है !

    allrounder के द्वारा
    July 17, 2012

    नमस्कार मित्र, चलिए फिर आप ही मुझे धर्म क्या समझा दीजिए, बड़ा उत्सुक हूँ मैं ये जानने के लिए कि धर्म क्या है आखिर ?

    rajuahuja के द्वारा
    July 17, 2012

    मित्रवर , धर्म की व्याख्या करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है ! धर्म तो असीम है, धर्म परोपकार है आत्मबोध है धर्म ! सत्य करुना प्रेमयुक्त भाव जब अंतस में उतरता है तो धर्म की लौ प्रज्वलित होती है तब अंत-प्रज्ञां जागती है और मिटता है अहंकार ! निर्विकार प्रज्ञां से होती है भावशुद्धि / विचारशुद्धि तब होता है मनन ! मनन से ही धर्म से सम्बन्ध बनता है ! शास्त्र कितना ही पढो धर्म से सम्बन्ध नहीं बनेगा ! मंदिर मस्जिद कोई धर्म से सम्बन्ध नहीं जोड़ पायेगा ! धर्म तो तब आता है जब कोई जाग जाता है ! भीतर से सुरति आती है ! धर्म मज़हब नहीं / धर्म रिलिज़न नहीं ! धर्म का वही अर्थ है जो बुद्ध के धम्मं का है ! धर्म का अर्थ है स्वभाव ! धर्म को आप जितना जानेंगे पाएंगे की यह तो कम है ,बहुत कुछ अभी और है जानने को ! ज्ञानियों का मत है , जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ ! मैं मूढा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ !!

yogi sarswat के द्वारा
July 16, 2012

कुलमिलाकर धर्म अनुभव/महसूस करने की कला है !मंदिर की घंटियों में ,अज़ान के स्वर में,चिड़ियों के चहचहाने में ,झरने के कल-कल करते संगीत में वृक्षों के लहलहाने में ! इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! अततः धार्मिक होना फक्र की बात है ! बिलकुल , अगर ऐसा धार्मिक बनता है कोई तो सच में धार्मिक hona बहुत मायने रखता है क्यूंकि यही असली धर्म है ! बहुत ही गंभीर लेखन है आपका राजू जी !

    rajuahuja के द्वारा
    July 16, 2012

    धन्यवाद सारस्वत जी ! आपकी प्रतिक्रिया मेरी प्रेरणा है , ह्रदय से आभार !

rekhafbd के द्वारा
July 16, 2012

आदरणीय राजू जी ,धर्म के उपर बहुत सुंदर विचार ,मै,आपसे पूर्णतया सहमत हूँ ,आभार

    rajuahuja के द्वारा
    July 16, 2012

    धन्यवाद् रेखा जी ! हर संस्कृति में धर्म का विशेष स्थान होता है ! विडम्बना ऐसी है की उससे साक्षात्कार हो ही नहीं पाता ! आपका स्नेह ही मेरा संबल है !,,,,,,,,,,,साधुवाद !

rajuahuja के द्वारा
July 15, 2012

आपका स्वागत है यमुना जी ! सच कहा आपने मूलभूत नैतिक प्रतिमान ही धर्म का बीज-मंत्र है ! आपका स्नेह मिला ,इसके लिए ह्रदय से आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
July 15, 2012

आदरणीय राजू जी, सादर ! “”कुलमिलाकर धर्म अनुभव/महसूस करने की कला है !मंदिर की घंटियों में , अज़ान के स्वर में,चिड़ियों के चहचहाने में ,झरने के कल-कल करते संगीत में वृक्षों के लहलहाने में ! इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! “”" बहुत सत्य बात ! शब्दों के अर्थ जानना और उसके भाव समझना दोनों अलग-अलग दो बातें हैं ! आजकल शब्दों के पीछे भागनेवाले ही बहुत हैं, भाव समझने और उसे आत्मसात करने वाले कम ! सुन्दर रचना ! सादर !

    rajuahuja के द्वारा
    July 15, 2012

    माननीय शशिभूषण जी , सादर प्रणाम ! शब्द तो पराये है ! उधार के ! शब्दकोष भरे पड़े हैं शब्दों से जो अच्छा लगे उठा लो ,जहाँ अच्छा लगे फिट कर दो ! लेकिन भाव , नितांत अपना ,स्वयं का ,आत्मबोध अंतरात्मा से निकला , पवित्र ! भाव शब्दों का मोहताज़ नहीं !हाँ शब्द माध्यम ज़रूर हैं लेकिन भाव तो बस…………! इसीलिए ज्ञानी कहते हैं ईश्वर भाव का भूखा है ! आज हर ओर शब्द ही शब्द हैं ! सभी धर्म-ग्रन्थ शब्दों सुसज्जित है और मूढ़ उन ग्रंथों की पूजा कर धन्य-धन्य हो रहे हैं ! शब्दों के पीछे जो भाव निहित हैं उनसे किसी का कोई सरोकार नहीं !यह विडंबना नहीं तो क्या है !

dineshaastik के द्वारा
July 15, 2012

आदरणीय राज जी, निम्न पंक्यतियों में आपने धर्म को बहुत ही सुन्दर ढ़ंग से परिभाषित किया हैः- “धर्म अनुभव/महसूस करने की कला है !मंदिर की घंटियों में ,अज़ान के स्वर में,चिड़ियों के चहचहाने में ,झरने के कल-कल करते संगीत में वृक्षों के लहलहाने में ! इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! अततः धार्मिक होना फक्र की बात है !” किन्तु मैं आपकी आस्तिकता की परिभाषा से सहमत नहीं हूँ, मेरा मानना है कि सत्य में आस्था या विश्वास करने या रखने वाला व्यक्ति ही आस्तिक है।

    rajuahuja के द्वारा
    July 15, 2012

    माननीय आस्तिक जी , सादर ! मैं आपके विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ ! परन्तु,क्या है सत्य ? ….जो शास्वत है वही सत्य है !जो नित्य है वही सत्य है ! जो स्थाई है वही सत्य है ! जो पूर्ण है वही सत्य है ! और परमात्मा शास्वत है ,नित्य है ,यथार्थ है ! सत्यनिष्ट , सत्यशील , सत्य-स्वरूप ब्रम्ह ही तो है ! ब्रम्ह अनुभव है ! सत्य के स्वरूप में ब्रम्ह को स्वीकारना अथवा प्रेम ,त्याग ,करूणा-भाव युक्त आस्था से ईश्वर को स्वीकारना दोनों में कही कोई फर्क नहीं ! जो है उसे स्वीकारना ही पड़ेगा इसमें कोई दो मत नहीं !

nishamittal के द्वारा
July 15, 2012

राज जी मेरे विचारानुसार धर्म और आस्था विश्वास पूर्णतया व्यक्तिगत विषय हैं,जो थोपे नहीं जाने चाहियें.समय के अनुसार व्यक्ति अपने अनुभव के आधार पर अपनी दिशा तय करता है आपकी ये पंक्तियाँ बहुत प्रभावी हैं कुलमिलाकर धर्म अनुभव/महसूस करने की कला है !मंदिर की घंटियों में ,अज़ान के स्वर में,चिड़ियों के चहचहाने में ,झरने के कल-कल करते संगीत में वृक्षों के लहलहाने में ! इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! अततः धार्मिक होना फक्र की बात है !

    rajuahuja के द्वारा
    July 15, 2012

    निशा जी ,सादर ! आपके विचार निसंदेह सही हैं !धर्म तो परिपक्वता के बाद का विषय है ! लेकिन ऐसा हो कहाँ रहा है ? यहाँ तो बच्चा जन्म से ही किसी न किसी प्रचलित धर्म की क्षत्र-छाया में पनपता है धर्म थोपा जाता है उस पर ! और विडम्बना यह की लोग इसे स्वीकारते भी है बिना किसी प्रतिरोध के !

jlsingh के द्वारा
July 15, 2012

आहूजा जी, नमस्कार! कुल मिलाकर आपने बातें सही कही है और गोस्वामी जी के शब्दों में – परहित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अघ्तायी ! इंसान द्वारा इंसान की भलाई के लिए उठा हर कदम धर्म ही तो है !प्यार भाई-चारे का हर सन्देश धर्म है !दुसरे के दुःख को अपना दुःख समझना ही धर्म है स्वयं के अन्दर जाकर स्वयं को देखना धर्म है ! यमुना जी ने भी अपने शब्दों में समझाने की कोशिश की है!

    rajuahuja के द्वारा
    July 15, 2012

    माननीय jlsingh साहब , आपकी प्रतिक्रिया मेरा सौभाग्य है ! अल्प-ज्ञानी हूँ जो कुछ देखा-समझा बयां कर दिया !स्नेह बनाये रखियेगा !

yamunapathak के द्वारा
July 14, 2012

बहुत विचारणीय लेख है आहूजा जी.धर्मं का अर्थ ही है धारण करना .मुलभुत नैतिक प्रतिमान ही प्रत्येक धर्मं की आधारशिला और मूल भाव हैं. एक अति मूल्यवान लेख के लिए बधाई.अंतिम पंक्ति ग्राह्य है.

    rajuahuja के द्वारा
    July 15, 2012

    माननीया यमुना जी त्रुटी-वश प्रतिउत्तर ऊपर पोस्ट हो गया है ,क्षमा चाहूँगा !


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