आह्वान

दिल की गहराइयों से

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ये कैसी आज़ादी रे भाई ....?

Posted On: 11 Aug, 2012 में

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an poor man<

 
ये कैसी आज़ादी रे भाई ?
बीच सड़क पर अबला लुट गई ,
शर्म किसी को न आई !
यह कैसी आज़ादी रे भाई ?
भूख से देखो गरीब मर रहा ,
लाखों टन अनाज सड़ रहा !
कौड़ी मोल बिक रहा यौवन ,
भीख मांग पल रहा है बचपन !
इनकी याद किसी को न आई ,
ये कैसी आज़ादी रे भाई ?

 

 

गाव की मत पूछ ,इसके रहनुमा सब सो गए ,
पानी नहीं -बिजली नहीं हालत बदतर हो गए !
जिसके कारण एक दिन हम घर से बे-घर हो गए !
भीड़ में शहर की दिल बुझा-बुझा सा लगता है ,
अपना वुजूद ही खुद से जुदा सा लगता है !
कभी-कभी तो खुद पे ही शर्म है आई !
ये कैसी आज़ादी रे भाई ?

आ गईं जबसे ज़म्हूरी ताकतें ,
बद से बदतर हो गए हालात हैं !
राजू बता कैसे हिफाज़त फ़स्ल की हो ?
बाढ़ ही जब खा रही हो खेत को !
किस खुदा को देंगें अब इसकी दुहाई ?
ये कैसी आज़ादी रे भाई ? ये कैसी आज़ादी ?

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashishgonda के द्वारा
August 14, 2012

आदरणीय!वर्तमान भारत का सीधा शब्दों में चित्रण, इसी सम्बन्ध में मेरी भी एक रचना पढ़ें- http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/08/13/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A8/

    rajuahuja के द्वारा
    August 14, 2012

    धन्यवाद् आशीष जी !

dineshaastik के द्वारा
August 12, 2012

आदरणीय राजू जी, सादर नमस्कार। भारत की वास्तिवक स्थिति का चित्रण करती हुई काव्यात्मक प्रस्तुति….. किन्तु मेरा मानना है कि हम कभी आजाद नहीं हुये थे। 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों एवं काँग्रेस के मध्य सत्ता हस्तान्तरण का समझौता हुआ था, वह भी अंग्रेजों की शर्तों पर। यदि मान भी लिया जाय कि हम आजाद भी हुये थे, तो वह आजादी संसद में कैद है। http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/08/07/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8B-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0/

    rajuahuja के द्वारा
    August 14, 2012

    माननीय दिनेश जी ! सच कहा आपने ,हमारी आज़ादी गोरे फिरंगियों द्वारा काले फिरंगियों को सशर्त सत्ता हस्तांतरण मात्र है !और एक हम हैं की आज़ादी की ख़ुशी में नाचते-नाचते कब हमारी पैंट सरक कर पैरों में आ गई हमें खुद भी नहीं मालूम !

nishamittal के द्वारा
August 11, 2012

कैसी और कौन सी आजादी है यही प्रश्न ज्वलंत है आज

    rajuahuja के द्वारा
    August 12, 2012

    बिलकुल सही कहा निशा जी आपने आज आज़ादी के मायने ही बदल गए हैं ! मनमानी , उदंडता सर चढ़ बोल रही है ! भ्रष्ट नेता ,भ्रष्ट अधिकारी , भ्रष्ट कर्मचारी , भ्रष्ट लोग सभी को लूट की आज़ादी हासिल है ! प्रतिक्रिया हेतु आभार …!


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